خاف ربك
إِنت وَينَك؟
كَيف حالَك؟
ما هُو قَلبي اللّي يِبيك
كُلّ جُرحٍ وَسَط صَدري
يِمرّني وَيِسأَل عَلَيك
خاف رَبّك
باللّي حَبّك
ما يِبي مِنّك الكَثير
إِنت كوَّن إِنسان، مُمكِن!
وَكَثر اللّه أَلف خَير
ما عَرَفتَك!
هذا إِنتَ؟
مُختلِف مِدري شِبلاك!
أَو هُو يُمكن هذا إِنتَ
بَس أَنا ما عُدت أَراك!
